उधमसिंहनगर प्रकरण के बाद सवालों के घेरे में पुलिस विभाग, क्या अन्य जिलों में भी मंडरा रहा “अटैचमेंट का भूत”?, कही दरोगा तो नहीं चला रहे इंस्पेक्टरों की कोतवाली

खबर डोज, देहरादून। उधमसिंहनगर जिले में किसान सुखवंत सिंह की आत्महत्या के मामले ने उत्तराखंड पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला केवल एक जिले तक सीमित नहीं दिखाई देता, बल्कि इससे पूरे प्रदेश, खासकर मैदानी जिलों में पुलिस अधिकारियों की तैनाती और अटैचमेंट व्यवस्था को लेकर बहस तेज हो गई है।
प्रदेश के कई मैदानी जिलों में यह चर्चा आम है कि “अटैचमेंट का भूत” लगातार मंडरा रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि कहीं इंस्पेक्टर की कोतवालियों को दरोगा तो नहीं चला रहे हैं और जिन अधिकारियों की वास्तविक तैनाती पहाड़ी जिलों में है, वह मैदानी जिलों में सेटिंग-गेटिंग के दम पर ड्यूटी निभा रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, उत्तराखंड के कई इंस्पेक्टर ऐसे हैं, जिनकी पोस्टिंग पहाड़ी जनपदों में है, लेकिन वह वर्षों से मैदानी जिलों में अटैचमेंट पर कार्यरत हैं। यही स्थिति कई उपनिरीक्षकों (दरोगाओं) की भी बताई जा रही है, जिनकी तैनाती कागजों में कहीं और, जबकि वास्तविक ड्यूटी कहीं और चल रही है।
गौरतलब है कि पूर्व में तत्कालीन आईजी गढ़वाल की ओर स्पष्ट आदेश जारी किए गए थे कि पहाड़ी जनपदों में तैनात इंस्पेक्टरों और दरोगाओं को नियमानुसार वहीं कार्यभार ग्रहण करना होगा। इस आदेश के तहत कई अधिकारियों को पहाड़ी जिलों में भेजा भी गया था। हालांकि, सूत्रों की मानें तो कई इंस्पेक्टर और दरोगा पहाड़ चढ़ने को तैयार नहीं हुए और कथित रूप से सेटिंग-गेटिंग के जरिए अपने तबादलों पर रोक लगवा ली।
बताया जा रहा है कि कुछ अधिकारी वर्षों बीत जाने के बाद भी पहाड़ी जिलों में कार्यभार ग्रहण नहीं कर पाए हैं, जिससे न केवल प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है, बल्कि मैदानी और पहाड़ी जिलों के बीच पुलिस बल के संतुलन पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
उधमसिंहनगर की घटना के बाद अब यह मांग तेज हो गई है कि पूरे प्रदेश में अटैचमेंट पर तैनात पुलिस अधिकारियों की सूची सार्वजनिक की जाए और वास्तविक पोस्टिंग के अनुसार सभी को कार्यभार सौंपा जाए। साथ ही यह भी जांच हो कि किन परिस्थितियों में नियमों को दरकिनार कर वर्षों से एक ही स्थान पर तैनाती दी जा रही है।
अब देखना यह होगा कि पुलिस मुख्यालय और गृह विभाग इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से लेते हैं और क्या प्रदेश में अटैचमेंट व्यवस्था पर वास्तव में लगाम लगाई जाएगी या फिर यह “भूत” आगे भी पुलिस सिस्टम पर हावी बना रहेगा।

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