डीजीपी के आदेशों की अनदेखी? हरिद्वार में उच्चीकृत कोतवालियों पर अब भी दरोगाओं का कब्जा, सिडकुल में बोर्ड बदलने का खेल

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खबर डोज, हरिद्वार। उत्तराखंड पुलिस मुख्यालय के आदेशों के बावजूद हरिद्वार जिले में थानों को कोतवाली में उच्चीकृत किए जाने की प्रक्रिया पूरी तरह लागू होती नजर नहीं आ रही है। कुछ माह पूर्व उत्तराखंड के डीजीपी दीपम सेठ ने प्रदेशभर में कई थानों को कोतवाली में उच्चीकृत करने के आदेश दिए थे और साथ ही इन कोतवालियों में निरीक्षकों की तैनाती तत्काल प्रभाव से करने के निर्देश भी जारी किए थे।

लेकिन हरिद्वार जनपद में स्थिति इससे उलट दिखाई दे रही है। जिले में कई ऐसी कोतवालियां हैं, जहां आज भी निरीक्षक की जगह दरोगा ही प्रभार संभाले हुए हैं। इससे साफ संकेत मिलते हैं कि पुलिस मुख्यालय के आदेशों का पूरी तरह पालन नहीं हो पा रहा है।

जानकारी के अनुसार हरिद्वार जनपद में कुल 17 थाने थे। इनमें से बुग्गावाला थाना को छोड़कर बाकी 16 थानों को कोतवाली में उच्चीकृत कर दिया गया था। उच्चीकरण के साथ ही इन सभी कोतवालियों में निरीक्षक स्तर के अधिकारियों की तैनाती भी की जानी थी, ताकि प्रशासनिक व्यवस्था मजबूत हो सके।

हालांकि, जमीनी स्थिति यह है कि सिडकुल, पथरी और कलियर जैसी महत्वपूर्ण कोतवालियों में अभी तक निरीक्षकों की तैनाती नहीं हो सकी है। इन स्थानों पर आज भी दरोगा स्तर के अधिकारी ही कोतवाली का संचालन कर रहे हैं। इससे यह सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर डीजीपी के आदेशों के बावजूद इन कोतवालियों में निरीक्षकों की नियुक्ति क्यों नहीं की गई।

सबसे ज्यादा चर्चा सिडकुल कोतवाली को लेकर हो रही है। बताया जा रहा है कि जब सिडकुल को थाना से कोतवाली में उच्चीकृत किया गया था, तब यहां कोतवाली का बोर्ड भी लगाया गया और निरीक्षक को प्रभारी बनाया गया था। लेकिन बाद में तबादले के बाद निरीक्षक की जगह फिर से दरोगा को प्रभारी बना दिया गया। इतना ही नहीं, कोतवाली के बोर्ड पर भी बदलाव करते हुए दोबारा “कोतवाली” की जगह “थाना” लिख दिया गया।

इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस महकमे में चर्चा है कि आखिर उच्चीकृत कोतवाली को दोबारा थाना दिखाने की जरूरत क्यों पड़ी और निरीक्षक की जगह दरोगा को प्रभारी क्यों बनाया गया।

स्थानीय लोगों और पुलिस व्यवस्था पर नजर रखने वालों का कहना है कि अगर कोतवालियों में निरीक्षक की तैनाती नहीं होती है तो उच्चीकरण का उद्देश्य ही अधूरा रह जाता है। वहीं पुलिस विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से इस पूरे मामले पर अभी तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

अब देखना होगा कि पुलिस मुख्यालय इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या हरिद्वार की इन कोतवालियों में डीजीपी के आदेशों के अनुरूप निरीक्षकों की तैनाती की जाती है या फिर यह मामला यूं ही चर्चा का विषय बना रहेगा।

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