डीजीपी साहब पुलिस सिस्टम में कैसा है यह असंतुलन: इंस्पेक्टर सर्वेसर्वा, दारोगा हाशिए पर, अब जिम्मेदार कौन?

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खबर डोज, देहरादून। डीजीपी साहब सिस्टम में यह कैसा असंतुलन आ गया है कि इंस्पेक्टर को सर्वेसर्वा मानकर दरोगाओं को हाशिए पर रख दिया गया है। जनपद में थानों के उच्चीकरण की प्रक्रिया ने पुलिस व्यवस्था के ढांचे को कागजों में तो मजबूत दिखा दिया है, लेकिन जमीनी स्तर पर यही बदलाव अब गंभीर असंतुलन की वजह बनता जा रहा है। हालात यह हैं कि लगभग हर थाने की कमान इंस्पेक्टरों के हाथों में सिमटती जा रही है, जबकि दारोगा संवर्ग धीरे-धीरे हाशिए पर धकेला जा रहा है। सवाल सीधा है कि अगर हर थाने और हर अहम जिम्मेदारी पर इंस्पेक्टर ही बैठेंगे, तो दारोगा आखिर जांच करेंगे क्या?
उच्चीकरण के बाद जिले में “चार्ज की राजनीति” खुलकर सामने आ गई है। दारोगा से इंस्पेक्टर बने अधिकारी नए थानों और कोतवालियों की दौड़ में आगे हैं, वहीं वर्षों से फील्ड में अपराध नियंत्रण, विवेचना और कानून व्यवस्था संभालने वाले अनुभवी दारोगा खुद को असहज स्थिति में पा रहे हैं। न पद हाथ में, न अधिकार—बस जिम्मेदारियों का बोझ।
पहले पुलिस कप्तान अपने विवेक से संतुलन साधते थे। बड़े, संवेदनशील और अपराध-प्रवण क्षेत्रों में अनुभवी दारोगाओं को जिम्मेदारी दी जाती थी, जिससे अपराध नियंत्रण बेहतर रहता था। लेकिन अब कहा जा रहा है कि यह विवेक धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है और फैसले “ऊपरी सिस्टम” के इशारों पर तय हो रहे हैं। नतीजा, स्थानीय जरूरतों से ज्यादा पद और रैंक को तरजीह।
थानों के उच्चीकरण का सबसे बड़ा असर दारोगा संवर्ग के मनोबल पर पड़ा है। कई काबिल अधिकारी यह सवाल पूछ रहे हैं कि जब अनुभव, क्षेत्रीय पकड़ और विवेचना की समझ की कोई अहमियत नहीं रह गई, तो फिर पुलिसिंग का असली आधार क्या है? सिर्फ इंस्पेक्टर लिखा हुआ नामपट्ट?
सूत्र बताते हैं कि कुछ प्रभावशाली इंस्पेक्टरों ने उच्चीकरण की प्रक्रिया को अपने पक्ष में मोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अंदरखाने ऐसा ताना-बाना बुना गया कि कोतवाली जैसे महत्वपूर्ण थानों की कमान सुरक्षित हाथों में पहुंच जाए, चाहे इसके लिए व्यवस्था की आत्मा से ही समझौता क्यों न करना पड़े।
पुलिस महकमे से जुड़े जानकार तंज कसते हुए कहते हैं कि “अगर सिर्फ बोर्ड बदलने से कानून व्यवस्था सुधर जाती, तो फिर सालों का अनुभव, मेहनत और जमीनी समझ किस काम की?” अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पुलिस सिस्टम संतुलन खो रहा है? और अगर हां, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा, कप्तान, सिस्टम या वो ‘अदृश्य ताकतें’ जो पर्दे के पीछे फैसले तय कर रही हैं?

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