न्याय के लिए भटकता रहा किसान सुखवंत, मरणासन्न बयान में बड़े अधिकारियों के नाम, कार्रवाई में सिर्फ छोटे अफसरों पर गिरी गाज, सरकार जन-जन के द्वार कार्यक्रम के दावे हवाई, यह हुई थी वीडियो वायरल

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खबर डोज, काशीपुर। प्रदेशभर में सरकार के “जन-जन के द्वार” कार्यक्रम की सराहना के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन किसान सुखवंत सिंह की आत्महत्या ने इस अभियान की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। न्याय की गुहार लगाते-लगाते किसान को आखिरकार आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा। विडंबना यह है कि मौत के बाद भी उसे पूरा न्याय मिलता नजर नहीं आ रहा है।

किसान आत्महत्या मामले में सामने आए वायरल वीडियो और मरणासन्न बयान के बाद पुलिस विभाग में हड़कंप जरूर मचा, लेकिन की गई कार्रवाई अब जनता के बीच चर्चा और आलोचना का विषय बन गई है। किसान सुखवंत सिंह ने आत्महत्या से पहले जारी किए गए वीडियो में कई बड़े अधिकारियों के नाम लेते हुए गंभीर आरोप लगाए थे, इसके बावजूद कार्रवाई केवल निचले स्तर के पुलिस अधिकारियों तक सीमित कर दी गई।


यह मामला हल्द्वानी के काठगोदाम थाना क्षेत्र अंतर्गत गौलापार स्थित एक होटल से जुड़ा है, जहां किसान सुखवंत सिंह ने आत्महत्या से पूर्व अपना वीडियो बयान जारी किया था। वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और उसमें पुलिस तथा प्रशासनिक स्तर पर अनदेखी और उत्पीड़न के आरोप लगाए गए थे। वीडियो सामने आने के बाद जनता में भारी आक्रोश देखने को मिला।


मामले में लापरवाही और उदासीनता के आरोपों के चलते एसएसपी द्वारा कोतवाली आईटीआई के थानाध्यक्ष उपनिरीक्षक कुंदन सिंह रौतेला और उपनिरीक्षक प्रकाश बिष्ट को निलंबित कर दिया गया। इसके साथ ही चौकी प्रभारी उपनिरीक्षक जितेंद्र कुमार, अपर उपनिरीक्षक सोमवीर सिंह, मुख्य आरक्षी शेखर बनकोटी, आरक्षी भूपेंद्र सिंह, दिनेश तिवारी, सुरेश चंद्र, योगेश चौधरी, राजेन्द्र गिरी, दीपक प्रसाद और संजय कुमार को लाइन हाजिर कर दिया।

हालांकि इस कार्रवाई के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब वायरल वीडियो में नामजद अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को जांच और कार्रवाई के दायरे से बाहर क्यों रखा गया। इसे लेकर पुलिस प्रशासन पर दोहरे मापदंड अपनाने के आरोप लग रहे हैं। आम लोगों का कहना है कि सिर्फ छोटे अफसरों पर कार्रवाई कर मामले की इतिश्री करना न्याय नहीं कहा जा सकता।


इधर, किसान सुखवंत सिंह के परिजनों ने प्रशासन के समक्ष तीन प्रमुख मांगें रखीं, जिनमें से दो मांगों पर प्रशासन की ओर से आश्वासन दिए जाने के बाद परिजनों ने सहमति जताई। बावजूद इसके, परिवार और किसान संगठनों में इस बात को लेकर नाराजगी बनी हुई है कि असली जिम्मेदारों तक कार्रवाई क्यों नहीं पहुंची।


मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी संज्ञान लेते हुए मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए हैं। यह जांच कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत को सौंपी गई है। अब प्रदेशभर की निगाहें इस जांच पर टिकी हैं कि क्या किसान सुखवंत सिंह के आरोपों की निष्पक्ष और गहराई से जांच होगी और क्या कार्रवाई का दायरा वास्तव में बड़े अधिकारियों तक भी पहुंचेगा, या फिर यह मामला केवल छोटे अफसरों पर कार्रवाई तक ही सिमट कर रह गया।

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