“रिलीव का भूत” हावी: तबादले के बाद भी पहाड़ चढ़ने को तैयार नहीं दरोगा, आदेशों की खुली अवहेलना

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खबर डोज, देहरादून। गढ़वाल मंडल में पुलिस विभाग के भीतर तबादला आदेशों को लेकर एक बार फिर ढिलाई और अनुशासनहीनता का मामला सामने आया है। आईजी गढ़वाल राजीव स्वरूप द्वारा हाल ही में जारी किए गए तबादला आदेशों के बावजूद कई उपनिरीक्षक (दरोगा) अब तक अपने नए तैनाती स्थल—विशेष रूप से पहाड़ी क्षेत्रों—में कार्यभार ग्रहण करने नहीं पहुंचे हैं। विभागीय सूत्रों की मानें तो “रिलीव” यानी कार्यमुक्ति की प्रक्रिया को जानबूझकर लंबित रखा जा रहा है, जिससे आदेशों का पालन टलता जा रहा है।

बताया जा रहा है कि अप्रैल माह की शुरुआत में आईजी गढ़वाल ने मंडल भर में करीब 100 से अधिक उपनिरीक्षकों के तबादले किए थे। इस सूची में वे अधिकारी शामिल थे, जो लंबे समय से मैदानी क्षेत्रों में तैनात थे और नियमानुसार अब उन्हें पहाड़ी जिलों में सेवाएं देनी थीं, लेकिन आदेश जारी होने के कई दिन बाद भी रिलीव नहीं किया गया है, जिससे पूरी प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई है।

सूत्रों के अनुसार, कई दरोगा पहाड़ में तैनाती से बचने के लिए सक्रिय हो गए हैं। कुछ अधिकारियों ने अपने प्रभाव और संपर्कों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है, ताकि किसी तरह तबादला रुकवाया जा सके या फिर रिलीव में देरी कर दी जाए। यही वजह है कि जिलों के स्तर पर उच्चाधिकारी भी इन मामलों में सख्ती दिखाने से बचते नजर आ रहे हैं।

विभाग के अंदरूनी जानकार बताते हैं कि यह कोई नया मामला नहीं है। हर बार जब भी बड़े स्तर पर तबादले होते हैं, “रिलीव का भूत” सक्रिय हो जाता है। अधिकारी अपने वर्तमान जिले से कार्यमुक्त होने में टालमटोल करते हैं, जिससे आदेश कागजों तक सीमित रह जाते हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है, जहां स्पष्ट निर्देशों के बावजूद आदेशों का पालन नहीं हो रहा।

इस स्थिति से न केवल विभागीय अनुशासन प्रभावित हो रहा है, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में पुलिस बल की कमी भी बनी रहती है। पहाड़ों में पहले से ही संसाधनों और स्टाफ की कमी की शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में यदि वहां तैनाती के आदेशों का पालन नहीं होगा, तो कानून-व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।

इस समस्या की जड़ में वर्षों से चला आ रहा असंतुलन है, जहां मैदानी क्षेत्रों को अधिक सुविधाजनक और पहाड़ी क्षेत्रों को चुनौतीपूर्ण माना जाता है। यही कारण है कि अधिकारी मैदानी तैनाती को प्राथमिकता देते हैं और पहाड़ जाने से बचने के प्रयास करते हैं। हालांकि विभागीय नियम स्पष्ट रूप से यह कहते हैं कि हर अधिकारी को निर्धारित अवधि के बाद विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में सेवा देनी होगी।

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब उच्च स्तर से आदेश जारी हो चुके हैं, तो उनका पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है? यदि जिला स्तर पर ही आदेशों को गंभीरता से नहीं लिया जाएगा, तो इससे विभाग की कार्यप्रणाली पर नकारात्मक असर पड़ना तय है।

सूत्रों का यह भी कहना है कि यदि समय रहते सख्ती नहीं बरती गई, तो यह प्रवृत्ति और बढ़ सकती है। इससे भविष्य में किसी भी तबादला आदेश को लागू करना मुश्किल हो जाएगा और अनुशासनहीनता को बढ़ावा मिलेगा।

फिलहाल निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आईजी स्तर से जारी इन आदेशों पर आगे क्या कार्रवाई होती है। क्या विभाग इस बार सख्त रुख अपनाकर सभी संबंधित अधिकारियों को समय पर रिलीव कराएगा, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा, यह आने वाला समय ही बताएगा।

उधर, आईजी गढ़वाल राजीव स्वरूप ने बताया कि 15 दिन के अंतराल में सभी के तबादले कर दिए जाएंगे। चारधाम यात्रा की व्यस्तता के चलते तबादलों में देरी हुई है। जल्द ही आदेशों का पालन कराया जाएगा।

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