शंकराचार्य चौक पर करोड़ों की लागत से बने शौचालय को तोड़कर आदि शंकराचार्य की मूर्ति स्थापित करने की तैयारी, मेला अधिष्ठान की प्लानिंग पर उठे सवाल

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–कुंभ-2021 के निर्माणों पर फिर उठे सवाल, पांच साल में ही करोड़ों की योजनाएं क्यों बदलनी पड़ीं?

खबर डोज, हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार में विकास कार्यों के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद यदि कुछ ही वर्षों में उन्हीं निर्माणों को तोड़ने या दूसरी जगह स्थानांतरित करने की नौबत आ जाए, तो नियोजन प्रक्रिया पर सवाल उठना लाजिमी है। कुंभ-2021 के दौरान शहर में चौक-चौराहों, यातायात व्यवस्था और श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए कई निर्माण कराए गए थे। अब पांच साल के भीतर ही कुछ निर्माणों में बदलाव की स्थिति सामने आने से मेला अधिष्ठान की दूरदर्शिता और योजनाओं की उपयोगिता पर सवाल उठने लगे हैं।

सबसे अधिक चर्चा शंकराचार्य चौक की है, जहां करोड़ों रुपये की लागत से बनाए गए शौचालय को तोड़ दिया गया है। अब इसी स्थल पर जगद्गुरु आदि शंकराचार्य की मूर्ति स्थापित करने की तैयारी की जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब इस स्थान पर भविष्य में मूर्ति स्थापित करने की योजना थी, तो यहां शौचालय का निर्माण क्यों कराया गया? क्या उस समय स्थल के चयन और शहर की दीर्घकालिक जरूरतों का सही आकलन नहीं किया गया था?

शौचालय वाले स्थल पर मूर्ति स्थापना की तैयारी, धार्मिक मर्यादा पर भी चर्चा

आदि शंकराचार्य सनातन परंपरा के प्रमुख आचार्यों में गिने जाते हैं। ऐसे में जिस स्थल पर उनकी मूर्ति स्थापित करने की तैयारी की जा रही है, उसके पूर्व उपयोग को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। लोगों के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या मूर्ति स्थापना के लिए धर्मनगरी में कोई अन्य उपयुक्त स्थान उपलब्ध नहीं था, जहां धार्मिक गरिमा के अनुरूप प्रतिमा स्थापित की जा सकती थी।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देव-मूर्तियों की स्थापना से पहले भूमि-शुद्धि और आवश्यक धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। प्रस्तावित स्थल पर भूमि-शुद्धि, गंगाजल के प्रयोग, यज्ञ-हवन अथवा अन्य धार्मिक प्रक्रियाओं का आयोजन हुआ है या नहीं, इस संबंध में आधिकारिक जानकारी सामने आनी चाहिए। हालांकि, इस विषय में संबंधित विभाग की ओर से स्थिति स्पष्ट किया जाना आवश्यक है, ताकि धार्मिक आस्था से जुड़े सवालों का तथ्यात्मक उत्तर मिल सके।

पांच साल में बदली योजनाएं, सार्वजनिक धन के सदुपयोग पर सवाल

कुंभ-2021 के दौरान कराए गए निर्माणों का उद्देश्य श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना और शहर की यातायात व्यवस्था को सुचारु बनाना था। लेकिन यदि उन्हीं निर्माणों को कुछ ही वर्षों में तोड़ना पड़े या उनकी जगह नए निर्माण करने पड़ें, तो यह संबंधित विभागों की योजना निर्माण प्रक्रिया की समीक्षा की मांग करता है।

सवाल यह भी है कि क्या वर्ष 2021 में योजनाएं बनाते समय भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखा गया था? क्या उस समय यातायात के संभावित दबाव, श्रद्धालुओं की आवाजाही और धार्मिक स्थलों के विकास की दीर्घकालिक आवश्यकताओं का आकलन किया गया था? यदि परिस्थितियों में बदलाव के कारण नए निर्णय लेने पड़े हैं, तो इसकी वजह भी सार्वजनिक की जानी चाहिए।

हरकी पैड़ी के निकट बने पैदल पुल को दूसरी जगह स्थानांतरित किए जाने की चर्चा भी इसी बहस को हवा दे रही है। यदि ऐसे निर्माणों की उपयोगिता पर कुछ वर्षों में ही पुनर्विचार करना पड़ रहा है, तो उनकी लागत, वर्तमान स्थिति और बदलाव की आवश्यकता का विस्तृत आकलन सामने आना चाहिए।

आखिर जिम्मेदारी किसकी, जवाबदेही तय होगी या नहीं?

जनता की गाढ़ी कमाई से होने वाले विकास कार्यों में केवल निर्माण पूरा कर देना ही पर्याप्त नहीं है। योजनाओं का टिकाऊ होना, उनका लंबे समय तक उपयोगी बने रहना और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। शंकराचार्य चौक पर शौचालय को तोड़ने और उसी स्थल पर मूर्ति स्थापना की तैयारी के मामले में भी संबंधित विभागों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पहले किए गए निर्माण पर कितना खर्च हुआ, उसे हटाने की जरूरत क्यों पड़ी और नए कार्य पर कितना व्यय प्रस्तावित है।

मेला अधिष्ठान तथा संबंधित विभागों की ओर से इन सवालों पर स्थिति स्पष्ट होने से न केवल सार्वजनिक धन के इस्तेमाल को लेकर पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि भविष्य की योजनाओं में ऐसी परिस्थितियों से बचने में भी मदद मिलेगी।

2033 के पूर्ण कुंभ से पहले गलतियों से सबक लेना जरूरी

हरिद्वार में वर्ष 2033 में पूर्ण कुंभ प्रस्तावित है। ऐसे में कुंभ-2021 के दौरान हुए निर्माणों और बाद में उनमें किए जा रहे बदलावों की समीक्षा करना जरूरी है। आगामी कुंभ की योजनाएं बनाते समय यातायात, पार्किंग, पैदल मार्गों, स्वच्छता, श्रद्धालुओं की सुविधाओं और धार्मिक स्थलों की गरिमा को ध्यान में रखकर दीर्घकालिक योजना तैयार की जानी चाहिए।

विकास का उद्देश्य केवल नए निर्माण कराना नहीं, बल्कि उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करना भी होना चाहिए। यदि पांच साल में ही करोड़ों रुपये के निर्माणों को तोड़ने या बदलने की जरूरत पड़ रही है, तो नियोजन प्रक्रिया में सुधार और जवाबदेही तय करना आवश्यक है। अब देखना होगा कि संबंधित विभाग इन सवालों का जवाब देते हैं या फिर करोड़ों रुपये के खर्च और बदलती योजनाओं का मुद्दा भी फाइलों तक ही सीमित रह जाता है।

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