दुगड्डा का ऐतिहासिक ‘चूना धारा’ मलबे में दफन, दो सदी पुरानी विरासत का पक्का ढांचा ध्वस्त, देखिए वीडियो

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खबर डोज, कोटद्वार। पौड़ी-मेरठ राष्ट्रीय राजमार्ग पर दुगड्डा में स्थित ऐतिहासिक चूना धारा शुक्रवार सुबह हुई भारी बारिश के बाद पहाड़ी से आए मलबे की चपेट में आकर पूरी तरह तबाह हो गई। मलबे के तेज बहाव ने इस प्राचीन जलस्रोत पर बने पक्के स्ट्रक्चर को भी ध्वस्त कर दिया। इसके साथ ही करीब दो सदी से राहगीरों की प्यास बुझाने वाली इस ऐतिहासिक धरोहर का स्वरूप भी मलबे में दफन हो गया।

बताया जाता है कि चूना धारा का इतिहास करीब दो सौ साल पुराना है। पौड़ी-मेरठ मार्ग से गुजरने वाले यात्रियों और राहगीरों के लिए यह जलस्रोत लंबे समय से राहत का प्रमुख केंद्र रहा है। पहाड़ों के बीच प्राकृतिक रूप से निकलने वाले इस स्रोत का पानी अपनी शीतलता और गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध रहा है।

औषधीय गुणों की थी मान्यता

स्थानीय लोगों के बीच चूना धारा के पानी को लेकर कई वर्षों से मान्यता रही है कि इसके पानी का सेवन करने से विभिन्न प्रकार की व्याधियों में लाभ मिलता था। इसी वजह से यहां राहगीरों के साथ आसपास के ग्रामीण और दूर-दराज से आने वाले लोग भी पानी पीने के लिए रुकते थे।

ब्रिटिश अफसर भी ले जाते थे पानी

चूना धारा का संबंध ब्रिटिशकालीन इतिहास से भी जुड़ा रहा है। बताया जाता है कि जब लैंसडाउन में ब्रिटिश सेना की छावनी स्थापित थी, तब वहां रहने वाले सेना के अधिकारी भी इस प्राकृतिक स्रोत के पानी को विशेष पसंद करते थे। यहां तक कि रोजाना इस स्रोत से पेयजल लैंसडाउन छावनी तक ले जाया जाता था। समय के साथ इस जलस्रोत के आसपास पक्का निर्माण कराया गया, जिससे राहगीरों को आसानी से पानी उपलब्ध हो सके। यह स्थान धीरे-धीरे क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा बन गया।

भारी बारिश ने बदल दिया स्वरूप

शुक्रवार सुबह हुई भारी बारिश के बाद पहाड़ी से बड़ी मात्रा में मलबा नीचे आया। मलबे के तेज बहाव में चूना धारा का पक्का स्ट्रक्चर भी टिक नहीं सका और देखते ही देखते पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। घटना के बाद ऐतिहासिक स्रोत का बड़ा हिस्सा मलबे से ढक गया है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि चूना धारा महज एक जलस्रोत नहीं, बल्कि क्षेत्र के इतिहास और पुरानी पीढ़ियों की यादों से जुड़ी धरोहर थी। लोगों ने प्रशासन और संबंधित विभाग से मौके का निरीक्षण कर मलबा हटाने, स्रोत को संरक्षित करने और इसके ऐतिहासिक स्वरूप को पुनर्जीवित करने की मांग की है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इस ऐतिहासिक जलस्रोत के संरक्षण की दिशा में कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां चूना धारा को केवल इतिहास के पन्नों में ही पढ़ पाएंगी।

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