पहचान को मोहताज होता जा रहा हाथी पुल, पेंटिंग और रिपेयरिंग के बाद भी टूटी पड़ी हाथी की मूर्तियां, देखिए वीडियो

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–कुंभ मेला 2027 की तैयारियों के बीच मरम्मत कार्य पर उठे सवाल, पुल पर रंग-रोगन तो हुआ लेकिन उसकी पहचान बने हाथियों की सुध लेना भूला विभाग

रिपोर्टर कालू वर्मा, खबर डोज, हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार में कुंभ मेला 2027 की तैयारियों के तहत विभिन्न निर्माण और सौंदर्यीकरण कार्य कराए जा रहे हैं। मेला प्रशासन और संबंधित विभागों की ओर से व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर कुछ ऐसे नजारे भी सामने आ रहे हैं, जो इन दावों और कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

हरिद्वार के प्रसिद्ध हाथी पुल पर इन दिनों मरम्मत और रंग-रोगन का कार्य किया गया है। पुल की पेंटिंग के साथ उसकी रिपेयरिंग भी की जा रही है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि पुल की पहचान माने जाने वाले हाथियों की मूर्तियों की हालत अब भी जस की तस बनी हुई है। हाथियों की टूटी हुई मूर्तियों को ठीक करने की ओर संबंधित विभाग का ध्यान नहीं गया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब पुल की मरम्मत और सौंदर्यीकरण का कार्य किया जा रहा था तो उसकी पहचान बने हाथियों की मरम्मत क्यों नहीं कराई गई?

हाथी पुल हरिद्वार की पहचान से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थल है। यहां से गुजरने वाले स्थानीय लोगों और यात्रियों के लिए पुल पर बनी हाथियों की आकृतियां इसकी खास पहचान हैं। ऐसे में पुल पर केवल पेंटिंग कर देना और टूटी मूर्तियों को नजरअंदाज करना सौंदर्यीकरण के उद्देश्य पर सवाल खड़े करता है।

कुंभ मेला 2027 से पहले जब शहर के विभिन्न क्षेत्रों में करोड़ों रुपये के विकास और सौंदर्यीकरण कार्य कराए जा रहे हैं, तब यह भी जरूरी है कि पुराने सार्वजनिक स्थलों की मरम्मत समग्र रूप से की जाए। केवल रंग-रोगन करके काम पूरा दिखाना पर्याप्त नहीं है।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या कुंभ मेला 2027 से पहले हाथी पुल पर बनी टूटी हाथियों की मूर्तियों की भी मरम्मत कराई जाएगी या फिर पुल को सिर्फ पेंट करके ही विभाग अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेगा?

संबंधित विभाग और मेला प्रशासन को मामले का संज्ञान लेते हुए हाथियों की मूर्तियों की मरम्मत करानी चाहिए, ताकि हाथी पुल अपनी वास्तविक पहचान और सुंदरता के साथ नजर आ सके। आखिर जिस पुल की पहचान ही हाथियों से है, वहां हाथियों की टूटी मूर्तियां बरकरार रहें तो सौंदर्यीकरण का क्या औचित्य?

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