सीएम साहब! खाद्य सुरक्षा विभाग पौड़ी के अधिकारी बन गए वीआईपी, पत्रकारों के फोन कर दिए ब्लॉक, लंबे समय से एक ही जिले में तैनाती पर भी सवाल

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–कोटद्वार में खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल, दीपावली से पहले लिए गए खाद्य पदार्थों के सैंपलों की रिपोर्ट त्योहार के बाद आने की बात, तब तक मिलावटखोरों पर कार्रवाई का क्या मतलब?

खबर डोज, कोटद्वार। उत्तराखंड में आम जनता के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी संभालने वाले खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होने लगे हैं। पौड़ी जिले में खाद्य सुरक्षा विभाग के अधिकारी अब खुद को वीआईपी समझने लगे हैं। हालात यह हैं कि विभागीय अधिकारियों से जानकारी लेने के लिए पत्रकारों द्वारा फोन किए जाने पर भी कथित तौर पर नंबर ब्लॉक किए जा रहे हैं। आखिर सरकारी विभाग के अधिकारी जनता और मीडिया के सवालों से इतने असहज क्यों हैं?

कोटद्वार में दीपावली जैसे बड़े त्योहार से ठीक पहले खाद्य सुरक्षा विभाग ने निरीक्षण और सैंपलिंग अभियान चलाया। विभाग की ओर से 12 खाद्य पदार्थों के नमूने लिए जाने की जानकारी दी गई, लेकिन सवाल यह है कि जब त्योहार के दौरान बाजार में मिठाइयों और खाद्य पदार्थों की सबसे अधिक खरीदारी होती है, तब इन नमूनों की जांच रिपोर्ट त्योहार के बाद आने से आम जनता को क्या फायदा मिलेगा? यदि किसी खाद्य पदार्थ में मिलावट है तो उसकी जानकारी उपभोक्ताओं को समय रहते कैसे मिलेगी?

मामला सिर्फ रिपोर्ट देर से आने तक सीमित नहीं है। खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 और इसके तहत बने नियमों में खाद्य नमूनों की जांच के लिए समयसीमा निर्धारित है। अधिनियम की धारा 46(3) और खाद्य सुरक्षा एवं मानक नियम, 2011 के नियम 2.4.2 के अनुसार खाद्य विश्लेषक को नमूना प्राप्त होने के 14 दिनों के भीतर जांच रिपोर्ट भेजनी होती है। यदि निर्धारित समय में जांच संभव नहीं है तो देरी का कारण बताते हुए नामित अधिकारी (Designated Officer) और खाद्य सुरक्षा आयुक्त को सूचित करना भी जरूरी है। India Code +1

ऐसे में सवाल यह है कि कोटद्वार में लिए गए नमूनों की जांच के लिए उन्हें प्रयोगशाला में कब भेजा गया? रिपोर्ट दीपावली के बाद आने की जानकारी किस आधार पर दी गई? क्या प्रयोगशाला की ओर से निर्धारित समयसीमा में जांच नहीं की जा रही है और यदि ऐसा है तो क्या इसकी लिखित सूचना संबंधित अधिकारियों को दी गई है?

इसके अलावा पौड़ी जिले में खाद्य सुरक्षा विभाग के अधिकारियों की लंबे समय से तैनाती भी चर्चा का विषय बनी हुई है। क्या विभाग में स्थानांतरण की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं है? क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने वाला कोई तंत्र नहीं है?

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से सवाल है कि आम जनता के स्वास्थ्य से जुड़े इस महत्वपूर्ण विभाग की कार्यप्रणाली की समीक्षा कब होगी? पत्रकारों के सवालों से बचने के बजाय अधिकारियों को पारदर्शिता के साथ जवाब देना चाहिए। आखिर खाद्य सुरक्षा विभाग जनता की सेहत की निगरानी के लिए है या सिर्फ त्योहारों पर सैंपलिंग की औपचारिकता पूरी करने के लिए?

अब देखना होगा कि शासन और जिला प्रशासन इस पूरे मामले का संज्ञान लेकर जांच रिपोर्ट में देरी, अधिकारियों की कार्यशैली और लंबे समय से एक ही जिले में तैनाती के सवालों पर क्या कार्रवाई करते हैं।

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