महिला अस्पताल (NPPL) में हिस्ट्रीशीटर को बना दिया सुपरवाइजर! विक्की गुप्ता पर पहले से दर्ज हैं मारपीट और स्मैक तस्करी के मुकदमे, सवालों के घेरे में अस्पताल प्रबंधन

–महिला अस्पताल NPPL में आरोपी की तैनाती पर उठे सवाल, आखिर किसके संरक्षण में करता रहा काम? अस्पताल प्रबंधन से लेकर स्वास्थ्य विभाग के पीएमएस की निगरानी व्यवस्था भी सवालों के घेरे में
खबर डोज, हरिद्वार। हरिद्वार के महिला अस्पताल (NPPL) में महिला कर्मचारी और प्रसूताओं के साथ आई महिलाओं से छेड़छाड़ के आरोप में सुपरवाइजर विक्की गुप्ता के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने के बाद अब उसकी कथित आपराधिक पृष्ठभूमि को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। कोतवाली नगर के प्रभारी निरीक्षक कुंदन सिंह राणा ने बताया कि विक्की गुप्ता नगर कोतवाली का हिस्ट्रीशीटर है। उसके खिलाफ मारपीट और स्मैक तस्करी जैसे गंभीर मामलों में भी मुकदमे दर्ज बताए जा रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक हिस्ट्रीशीटर को महिला अस्पताल जैसे संवेदनशील संस्थान में सुपरवाइजर की जिम्मेदारी किसने सौंप दी?
महिला अस्पताल में बड़ी संख्या में महिलाएं प्रसव और उपचार के लिए पहुंचती हैं। उनके साथ परिजन भी अस्पताल में रुकते हैं। ऐसे संवेदनशील स्थान पर कर्मचारियों की नियुक्ति और उनके पुलिस सत्यापन को लेकर विशेष सतर्कता बरती जानी चाहिए। लेकिन विक्की गुप्ता से जुड़ा मामला सामने आने के बाद अस्पताल प्रबंधन की नियुक्ति प्रक्रिया और निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं।
किसके संरक्षण में चलता रहा आरोपी का कामकाज?
अब सवाल सिर्फ मुकदमा दर्ज होने तक सीमित नहीं है। चर्चा इस बात की भी है कि यदि विक्की गुप्ता की आपराधिक पृष्ठभूमि पहले से पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज थी तो अस्पताल प्रबंधन को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई? क्या नियुक्ति से पहले पुलिस सत्यापन कराया गया था? यदि कराया गया था तो रिपोर्ट में क्या सामने आया? और यदि सत्यापन नहीं हुआ तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
महिला कर्मचारी की शिकायत के बाद सामने आए आरोपों ने अस्पताल प्रबंधन की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। आखिर अस्पताल में आरोपी को किसका संरक्षण हासिल था? क्या पहले भी उसके व्यवहार को लेकर शिकायतें हुई थीं और उन्हें नजरअंदाज किया जाता रहा?
पीएमएस के सुपरविजन पर भी सवाल
हरिद्वार स्वास्थ्य विभाग के पीएमएस (प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक) की निगरानी व्यवस्था भी अब सवालों के घेरे में है। अस्पताल में तैनात कर्मचारियों की नियुक्ति, कार्यप्रणाली और आचरण की निगरानी आखिर किसकी जिम्मेदारी है? क्या पीएमएस स्तर पर कभी कर्मचारियों के पुलिस सत्यापन और उनकी पृष्ठभूमि की समीक्षा की गई?
स्वास्थ्य विभाग अक्सर अस्पतालों की व्यवस्थाओं और शिकायतों पर अपना पक्ष रखता है, लेकिन इस मामले में जवाबदेही तय करना जरूरी है। आखिर कब तक अस्पताल प्रबंधन और स्वास्थ्य विभाग अपनी जिम्मेदारी से बचते रहेंगे? क्या इस बार भी मामले की जांच के नाम पर जिम्मेदारों को क्लीन चिट दे दी जाएगी?
अब जरूरत केवल आरोपी के खिलाफ पुलिस कार्रवाई तक सीमित रहने की नहीं, बल्कि उसकी नियुक्ति से लेकर अस्पताल में तैनाती और शिकायतों पर हुई कार्रवाई तक पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच की है। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि महिला अस्पताल जैसे संवेदनशील संस्थान में कर्मचारियों के सत्यापन और महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी किस अधिकारी की है।
महिला अस्पताल में इलाज और सुरक्षा की उम्मीद लेकर पहुंचने वाली महिलाओं की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होना चाहिए।

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