उत्तराखंड पुलिस में वीआईपी कल्चर हावी! आईजी गढ़वाल के आदेशों के बावजूद भी पहाड़ चढ़ने को तैयार नहीं अधिकारी

खबर डोज, देहरादून। उत्तराखंड पुलिस विभाग में तबादला नीति को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो रहे हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में निर्धारित कार्यकाल पूरा कर चुके पुलिसकर्मियों को मैदानी जिलों में तैनात करने और मैदानी जनपदों में लंबे समय से जमे अधिकारियों को पहाड़ भेजने का फैसला उच्च स्तर पर लिया गया था। इस फैसले का उद्देश्य पहाड़ और मैदान के बीच संतुलन बनाना और दोनों क्षेत्रों में बेहतर कानून व्यवस्था सुनिश्चित करना था। हालांकि जमीनी हकीकत इस नीति के ठीक उलट नजर आ रही है।
सूत्रों के मुताबिक, पुलिस मुख्यालय स्तर से कई बार तबादला आदेश जारी किए गए, जिनमें इंस्पेक्टर और उपनिरीक्षकों (दारोगाओं) को पर्वतीय क्षेत्रों में भेजा गया। कुछ पुलिसकर्मियों ने इन आदेशों का पालन करते हुए पहाड़ी जनपदों में ज्वाइन भी किया, लेकिन कई ऐसे अधिकारी भी हैं जो वर्षों से मैदानी जिलों में ही जमे हुए हैं और अब तक पहाड़ की पोस्टिंग से बचते रहे हैं।
बताया जा रहा है कि विभाग में एक अनौपचारिक “वीआईपी संस्कृति” भी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है। कुछ पुलिसकर्मी, जिन्हें प्रभावशाली या सिफारिशी माना जाता है, वे या तो अपने तबादले रुकवाने में सफल हो जाते हैं या फिर पहाड़ में पोस्टिंग के बावजूद किसी न किसी तरीके से मैदानी जनपदों में संबद्ध रहकर अपनी सेवा पूरी कर लेते हैं। इससे न केवल तबादला नीति की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, बल्कि अन्य कर्मियों में असंतोष भी बढ़ रहा है।
कई मामलों में यह भी सामने आया है कि जिन अधिकारियों का तबादला पहाड़ी जिलों में हुआ, उन्होंने बाद में दोबारा मैदानी क्षेत्रों में वापसी करा ली। इससे यह संदेश जा रहा है कि नियम सभी के लिए समान नहीं हैं और प्रभावशाली लोगों को विशेष छूट मिल रही है। विभाग के अंदर ही इस बात को लेकर चर्चा है कि आईजी स्तर से जारी आदेशों का पूरी तरह पालन नहीं हो पा रहा है, जिससे उच्चाधिकारियों की साख पर भी असर पड़ रहा है।
पर्वतीय क्षेत्रों में पुलिस बल की कमी लंबे समय से एक चुनौती रही है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के कारण वहां ड्यूटी करना चुनौतीपूर्ण माना जाता है। ऐसे में यदि तबादला नीति का सख्ती से पालन नहीं होता, तो पहाड़ में तैनात पुलिसकर्मियों पर कार्यभार और बढ़ जाता है, जिसका सीधा असर कानून व्यवस्था पर पड़ सकता है।
वहीं दूसरी ओर, मैदानी जिलों में लंबे समय से जमे अधिकारियों के कारण कार्यप्रणाली में भी पारदर्शिता को लेकर सवाल उठते हैं। स्थानीय स्तर पर नेटवर्क मजबूत होने से निष्पक्ष कार्रवाई प्रभावित होने की आशंका भी जताई जा रही है।
जानकारों का मानना है कि यदि विभाग को अपनी साख बनाए रखनी है तो तबादला नीति को सख्ती से लागू करना होगा। साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी अधिकारी नियमों से ऊपर न हो।
फिलहाल यह देखना अहम होगा कि उच्चाधिकारी इस स्थिति को सुधारने के लिए क्या कदम उठाते हैं और क्या वाकई पहाड़ और मैदान के बीच संतुलन बनाने की मंशा जमीन पर उतर पाती है या नहीं।
इससे पूर्व भी खबर डोज ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया था, जिसमें आईजी गढ़वाल राजीव स्वरूप ने 15 दिन के अंतराल में तबादला आदेश का पालन करवाने की बात कही थी, लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई अमल में नहीं लाई गई।

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