उत्तराखंड में तबादला नीति पर शासन का बड़ा फैसला, गंभीर बीमारी और दंपति मामलों में मिलेगी राहत

खबर डोज, देहरादून। उत्तराखंड सरकार ने वार्षिक स्थानांतरण अधिनियम-2017 के क्रियान्वयन को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। कार्मिक एवं सतर्कता विभाग की ओर से जारी नए आदेश में गंभीर बीमारी, दिव्यांगता, दंपति कर्मचारियों की तैनाती और माता-पिता की देखभाल जैसे मानवीय पहलुओं को स्थानांतरण प्रक्रिया में विशेष महत्व देने का निर्णय लिया गया है। शासन के इस कदम से हजारों सरकारी कर्मचारियों को राहत मिलने की उम्मीद है।
अपर सचिव गिरधारी सिंह रावत द्वारा जारी आदेश में सभी विभागों, मंडलायुक्तों और जिलाधिकारियों को निर्देशित किया गया है कि स्थानांतरण प्रक्रिया के दौरान अधिनियम की मूल भावना के साथ-साथ कर्मचारियों की पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों का भी ध्यान रखा जाए। शासन ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी विभाग को विशेष परिस्थितियों में स्थानांतरण नियमों में संशोधन, छूट या परिवर्तन की आवश्यकता महसूस होती है तो वह प्रस्ताव मुख्य सचिव के माध्यम से शासन को भेज सकता है। ऐसे मामलों में मुख्यमंत्री की अनुमति के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
गंभीर बीमारी और दिव्यांगता के मामलों में विशेष राहत
नए आदेश के तहत गंभीर बीमारी से जूझ रहे कर्मचारियों को स्थानांतरण में विशेष सुविधा प्रदान की जाएगी। इसके अंतर्गत कर्मचारी स्वयं, उनके पति या पत्नी, अविवाहित या विवाहित महिला कर्मचारी के जीवनसाथी अथवा 18 वर्ष तक की आयु के बच्चों के गंभीर रोग या दिव्यांगता को स्थानांतरण का आधार माना जाएगा।
इसके अलावा जिन कर्मचारियों के माता-पिता गंभीर बीमारी से ग्रसित हैं या परिवार के अन्य सदस्य पूरी तरह उन पर आश्रित हैं, उनके मामलों पर भी संवेदनशीलता के साथ विचार किया जाएगा। शासन का मानना है कि ऐसी परिस्थितियों में कर्मचारियों को परिवार से दूर तैनात रखने से उनकी कार्यक्षमता और पारिवारिक जीवन दोनों प्रभावित होते हैं।
दंपति कर्मचारियों को एक स्थान पर तैनाती का प्रयास
सरकार ने पति-पत्नी दोनों के सरकारी सेवा में होने की स्थिति को भी महत्वपूर्ण मानते हुए स्पष्ट किया है कि ऐसे कर्मचारियों को यथासंभव एक ही स्थान या निकटवर्ती क्षेत्रों में तैनात करने का प्रयास किया जाएगा। विभागीय अधिकारी उपलब्ध रिक्तियों, कार्यस्थल और पारिवारिक परिस्थितियों का आकलन कर निर्णय लेंगे।
शासन का मानना है कि इससे पारिवारिक जीवन और सरकारी दायित्वों के बीच बेहतर संतुलन स्थापित होगा तथा कर्मचारियों की कार्यक्षमता में भी सुधार आएगा।
गृह जनपद और गृह स्थान को लेकर भी स्पष्टता
लंबे समय से गृह जनपद और गृह स्थान की व्याख्या को लेकर बनी भ्रम की स्थिति को भी नए आदेश में स्पष्ट किया गया है। शासन के अनुसार कर्मचारी का मूल निवास जिस गांव, कस्बे या तहसील में स्थित है, उसे उसका “गृह स्थान” माना जाएगा। वहीं उसी जिले के अन्य गांव, कस्बे या तहसील में तैनाती को “गृह जनपद” के अंतर्गत माना जा सकेगा।
यह व्यवस्था विशेष रूप से समूह ‘ग’ के लिपिकीय एवं गैर-प्रशासनिक कर्मचारियों तथा समूह ‘घ’ कर्मचारियों पर लागू होगी, जिन्हें गृह स्थान को छोड़कर गृह जनपद में तैनाती का लाभ मिल सकेगा।
विभागों को दिए गए मानवीय दृष्टिकोण अपनाने के निर्देश
शासन ने सभी विभागों को निर्देशित किया है कि स्थानांतरण संबंधी मामलों का निस्तारण करते समय केवल प्रशासनिक आवश्यकताओं ही नहीं, बल्कि कर्मचारियों की वास्तविक पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों का भी मूल्यांकन किया जाए। सरकार का मानना है कि इससे कर्मचारियों के मनोबल में वृद्धि होगी और प्रशासनिक कार्यों के संचालन में भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
नए आदेश को राज्य की तबादला नीति में एक महत्वपूर्ण मानवीय पहल माना जा रहा है, जिससे गंभीर बीमारी, पारिवारिक जिम्मेदारियों और दंपति कर्मचारियों से जुड़े मामलों में कर्मचारियों को बड़ी राहत मिलेगी।

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